Hindi Pedagogy : भाषा शिक्षण में सुनने, बोलने की भूमिका, भाषा के कार्य, बच्‍चे भाषा का प्रयोग कैसे करते है

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 इस पोस्‍ट में हम हिन्‍दी पेडागॉजी के अध्‍ययन 3 : भाषा शिक्षण में सुनने, बोलने की भूमिका, भाषा के कार्य, बच्‍चे भाषा का प्रयोग कैसे करते है । के बारे में विस्‍तार से जानने वाले है जिससे आपके सभी प्रश्‍नों के उत्तर आप सभी को मिल सके । 

Hindi Pedagogy : भाषा शिक्षण में सुनने, बोलने की भूमिका, भाषा के कार्य, बच्‍चे भाषा का प्रयोग कैसे करते है


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भाषा शिक्षण में सुनने और बोलने की भूमिका

भाषा के माध्‍यम से मानव जीवन अर्थपूर्ण है । भाषा मानव जीवन को सरल और सहज बनाने में महत्‍वपूर्ण है । भाष के माध्‍यम से व्‍यक्ति अपने विचार और भाव प्रकट कर सकता है । मानव ईश्‍वर की बनाई हुई अन्‍य रचनाओ में से श्रेष्‍ठ इसलिए है क्‍योकि उसे भाषा कौशल का ज्ञान है भाषा बैध्दिक क्षमता को भी व्‍यक्‍त करती है । भाषा एक ऐसी कला है जिसे अन्‍य कलाओ की भांति सीखा जा सकता है और उसमें निपुणता हासिल की जा सकती है । 

भाषा को श्रवण एवं वाचक द्वारा ग्रहण किया जा सकता है भाषा में दिन प्रतिदिन नित नए विकास होते है भाषा में चार प्रकार के कौशल होते है श्रवण कौशल , वाचित कौशल लेखन कौशल और पठन कौशल । श्रवण कौशल और वाचक कौशल , भाषा कौशल के प्रथम चरण में आते है । 


श्रवण कौशल की भूमिका

    1. श्रवण कौशल में व्‍यक्ति रोज नए शब्‍दो को सुनता है और अपने भाषायी ज्ञान में विकास करता है । इस कौशल से व्‍यक्ति अपने शब्‍दकोश में वृध्दि करता है जिसके माध्‍यम से उसके भाषा कौशल में विकास होता है                                                                                                                                     
    2. सुनने की प्रक्रिया के माध्‍यम से व्‍यक्ति दूसरो के भावो , विचारो अभिव्‍यक्तियो को ग्रहरण कर सकता है । ध्‍वनि व्‍यक्ति के मस्तिष्‍क में एक छाप छोडती है जिससे उस विशेष शब्‍द से संबंधित ध्‍वनि व्‍यक्ति को स्‍मरण रह जाती है                                                                                                                             
    3. सुनकर व्‍यक्ति अधिक से अधिक ज्ञान अर्जि‍त कर सकता है । यह ऐसी प्रक्रिया  है जिसमें व्‍यक्ति दिन-प्रति दिन बिना किसी रूकावर के ज्ञान प्राप्‍त कर सकता है और उस ज्ञान को अपने विवेकानुसार प्रयोग कर सकता है । छात्र रेडिया , मोबाइल , टी.वी. , ओडियो कैसेट जैसे उपकरणो के माध्‍यम से सामाजिक व्‍यवहारिक जानकारियां प्राप्‍त कर सकता है                                                                           
    4. श्रवण कौशल का अर्थ कानो द्वारा सुनना । इस प्रक्रिया में किसी दूसरे व्‍यक्ति द्वारा कही गई बात को सुनते है और उसका भाव ग्रहण करते हे । यह शिक्षा के आदान- प्रदान का महत्‍वपूर्ण भाव है इसमें व्‍यक्ति कविता, कहानी भाषण वाद- विवाद , वार्तालाप आदि का ज्ञान सुनकर ही प्राप्‍त करता है और  उसका अर्थ भी ग्रहण करता है । यदि व्‍यक्ति की श्रवण इन्द्रियो मे दोष है तो वह न तो भाषा सीख सकता है और न अपने मनोभावो को व्‍यक्‍त कर सकता है अत: उसका भाषा ज्ञान अर्जित करता है । श्रवण कौशल भाषा के विकास का आधार है इसमें महत्‍वपूर्ण भूमिका भी निभाता है ।

वाचिक कौशल की भुमिका

    1. बोलकर व्‍यक्ति अपनी अभिव्‍यक्ति मनोभावो को प्रकट करता है । इस प्रक्रिया में व्‍यक्ति बोलकर लोगो से संवाद स्‍थापित करता है । साथ ही संचार की प्रक्रिया पूर्ण होती है । वाचिक कौशल में निपुणता से छात्र में आत्‍मविश्‍वास उत्‍पन्‍न होता है जो कि शिक्षण और बच्‍चे के सम्‍पूर्ण विकास के लिए अत्‍यंत आवश्‍यक है                                                                                                                             
    2. वाचिक कौशल से यह पता लगाया जा सकता है कि शिक्षण प्रक्रिया में कोइ त्रुटि तो नही है वाचिक कौशल से मूल्‍यांकन प्रक्रिया में सहायता मिलती है इसके माध्‍यम से अध्‍यापक छात्र की भाषा से संबंधित त्रुटियों का पता लगा सकता है और शिक्षण के दौरन उन त्रुटियो को दूर करके छात्र को निपुण बना सकता है                                                                                                                      
    3. आधुनिक युग में समाज में अपनी छवि को बनाने के लिए और स्‍वयं को प्रस्‍तुत करने के लिए आत्‍मविश्‍वास का होना बहुत जरूरी है यह आत्‍मविश्‍वास छात्र में वाचिक कौशल में निपुणता से प्राप्‍त होता है इससे छात्र झिझक को खत्‍म कर आगे कदम बढाता है । जब तक छात्र अपने विचार अभिव्‍यक्‍त  करना नही सीखता है तब त‍क उसमें भाषा का विकास नही होता । वाचिक कौशल में कक्षा में ही सुधार  किया जाता है कक्षा में छात्र  संकोच समाप्‍त करके बोलना आरम्‍भ करता है और विभिन्‍न विषयो पर वाद-विवाद करता है जिससे उसका शिक्षण विकास होता है                                     
    4. बोलने के माध्‍यम से छात्र भाषा प्रवाह में प्रवीणता और निपुणता हासिल करता हे । भाष में उसकी दक्षता और मजबूत होती है । भाषा विकास में बोलने का काफी महत्‍व है । भाषण , वाद-विवाद प्रतियोगिता प्रश्‍नोत्‍तरी के माध्‍यम से शिक्षण प्रक्रिया को सुदृढ़ बनता है । यह बालक को मौखिक अभिव्‍यक्ति के लिए प्रेरित करता है जो उसके भाषा विकास में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है भाषा का विकास प्रतिदिन होता है ।यदि बोलने का कौशल छात्र में विकास नही होता तो इस स्थिति में सीखने की प्रक्रिया बहुत धीमी  हो जाती है

भाषा के कार्य


भाषा के बिना मनुष्‍य पशु के समान है भाषा के कारण ही मनुष्‍य सर्वश्रेष्‍ठ प्राणी है मनुष्‍य के व्‍यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में भाषा का ब‍हुत महत्‍व है इसके कार्य निम्‍नलिखित है
    1. भाषा भावाभिव्‍यक्ति का साधन है 
    2. भाषा मानव विकास का मूलाधार है
    3. भाषा मानव सभ्‍यता एवं संस्‍कृति की पहचान है
    4. विचार शक्ति का विकास
    5. ज्ञान प्राप्ति का प्रमुख साधन है 
    6. भाषा मानव के भाव , अनुभाव एवं आकांक्षाओ को सुरक्षित रखती है


बच्‍चे भाषा का प्रयोग कैसे करते है 

    1. सीखने में – बच्‍चे भाषा के माध्‍यम से ही सीखते है एवं सोचते है बच्‍चो के लिए भाषा एक उपकरण के रूप में कार्य करती है जो बच्‍चा जितनी जल्‍दी बोलना सीखता है वह उतनी ही जल्‍दी सोचता है
    2. क्षमतओ का वि‍कास करने में – बच्‍चे अपनी क्षमताओ का विकास भाषा के माध्‍यम से करते है विभिन्‍न प्रकार के विचारो के आदान-प्रदान के द्वारा विभिन्‍न क्षमताओ का विकास करते है 
    3. मानव सभ्‍यता एवं सस्‍कृति की पहचान करने में – बच्‍चे भाषा क माध्‍यम से साहित्‍य के द्वारा अपनी सभ्‍यता एवं संस्‍कृति का ज्ञान प्राप्‍त करते है तथा उसे पहचानते है 
    4. भाषा से अपना बौध्दिक व मानसिक विकास करने में- विचारो के अभाव में मनुष्‍य का मानसिक विकास असंभव है क्‍योकि विचार और भाषा का अटूट संबंध होता है विचारो से भाषा का जन्‍म होता है तथा भाषा विचारो को जन्‍म देती है भौतिक व मानसिक विकास के लिए विचार शक्ति की आवश्‍यकता


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